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सी एम जैन
किसी भी आंदोलन की सफलता के बाद जश्न की रोशनी अक्सर मंच पर चमकते चेहरों पर आकर ठहर जाती है। तालियों की गड़गड़ाहट और भाषणों की गूंज के बीच इतिहास अक्सर उन किरदारों को भूल जाता है, जिनकी बदौलत वह आंदोलन सड़क से निकलकर देश के हर आम नागरिक की मोबाइल स्क्रीन तक पहुँचता है। फिर चाहे वह किसी छोटे शहर का स्थानीय पत्रकार ही क्यों न हो, जो विपरीत परिस्थितियों में भी सच को कैमरे और पन्नों में कैद कर रहा होता है।
यह सत्य है कि किसी भी आंदोलन की सबसे पहली जीत सड़क पर नहीं, बल्कि ‘सूचना’ में होती है। और उस सूचना का सबसे पहला प्रहरी पत्रकार ही होता है।
इतिहास को सुधारनी होगी अपनी यह पुरानी भूल शायद अब समय आ गया है कि इतिहास अपनी उस पुरानी गलती को सुधारे। उसे केवल यह दर्ज नहीं करना चाहिए कि मंच से किसने ओजस्वी भाषण दिया, बल्कि यह भी लिखना चाहिए कि उस भाषण को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने वाला कलमकार कौन था। इतिहास को सिर्फ यह नहीं बताना चाहिए कि किसने आंदोलन का नेतृत्व किया, बल्कि यह भी रेखांकित करना होगा कि किसने उस संघर्ष को गुमनामी के अंधेरे से निकालकर राष्ट्रीय चेतना का मुख्य हिस्सा बनाया।लोकतंत्र की विडंबना यह है कि यहाँ कई बार सबसे बड़ा योद्धा वह नहीं होता जो मंच पर दिखाई देता है, बल्कि सबसे बड़ा योद्धा वह होता है जिसकी तस्वीर कभी अखबारों के पन्नों पर छपती ही नहीं।
जिस दिन भारत अपने उन तमाम गुमनाम और मैदानी पत्रकारों के संघर्ष को पहचानना सीख जाएगा, शायद उसी दिन हमारा लोकतंत्र अपने सबसे ईमानदार और सच्चे सिपाहियों को उनका वास्तविक सम्मान दे पाएगा।