अगर आपके पूर्वज आज वापस आ जाएँ, तो किस बात पर आपको गर्व होगा?
कल्पना कीजिए कि आज रात आपके घर का दरवाज़ा खटखटाए। आप दरवाज़ा खोलें और सामने आपके दादा, परदादा, उनके भी पूर्वज खड़े हों। वे लोग जिन्होंने खेत जोते, अकाल झेले, पलायन किया, कर्ज़ चुकाए, परिवार बचाए, बच्चों को पढ़ाया, अपमान सहे, संघर्ष किए और अपनी पूरी जिंदगी इस उम्मीद में खपा दी कि आने वाली पीढ़ियाँ उनसे बेहतर जीवन जिएँगी।वे आपके घर में बैठें। आपके बच्चों को देखें। आपका शहर देखें। आपका मोबाइल, आपकी गाड़ी, आपका घर, आपकी सुविधाएँ देखें। शायद पहली नज़र में वे खुश हों। उन्हें लगे कि उनकी मेहनत रंग लाई। जिस जीवन के बारे में उन्होंने केवल कल्पना की थी, वह आज उनके वंशज जी रहे हैं।लेकिन क्या कहानी यहीं खत्म हो जाएगी?
कुछ देर बाद शायद वे आपसे सवाल पूछना शुरू करें।वे पूछेंगे कि हमने तुम्हें जमीन दी थी, तुमने उसके साथ क्या किया? हमने तुम्हें आज़ादी दी थी, तुमने उसका क्या किया? हमने तुम्हें अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया था, तुमने उनका उपयोग कितना किया? हमने तुम्हारे लिए बेहतर समाज का सपना देखा था, तुमने उसे बेहतर बनाया या केवल उसका उपभोग किया?यहीं से असली परीक्षा शुरू होती है। क्योंकि पूर्वज केवल यह नहीं देखते कि उनके वंशज कितने अमीर हुए। वे यह भी देखते हैं कि उनके वंशज कितने जिम्मेदार हुए।हम अक्सर अपने पूर्वजों की तस्वीरों पर फूल चढ़ाते हैं। उनकी कहानियाँ सुनते हैं। उनके संघर्षों का सम्मान करते हैं। लेकिन शायद ही कभी यह सोचते हैं कि यदि वे स्वयं लौटकर हमें देख लें तो क्या कहेंगे।
क्या वे उस समाज पर गर्व करेंगे जहाँ लोग अपने अधिकार तो जानते हैं, लेकिन अपने कर्तव्य भूलते जा रहे हैं? क्या वे उस नागरिक पर गर्व करेंगे जो सरकार को गालियाँ तो देता है, लेकिन कभी यह जानने की कोशिश नहीं करता कि उसके नाम पर खर्च होने वाला पैसा कहाँ जा रहा है? क्या वे उस पीढ़ी पर गर्व करेंगे जो अपने मोबाइल का हर फीचर जानती है, लेकिन अपने संविधान के बुनियादी अधिकार और लोकतांत्रिक शक्तियों से परिचित नहीं है? क्या वे उस समाज पर गर्व करेंगे जहाँ लोग घंटों मनोरंजन पर खर्च कर सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक मामलों में रुचि लेने के लिए उनके पास समय नहीं है?
हम अपने पूर्वजों को अक्सर गरीबी, अभाव और कठिनाइयों से जोड़कर देखते हैं। लेकिन उनके पास एक चीज़ थी जो आधुनिक समाज में तेजी से दुर्लभ होती जा रही है—सामूहिक जिम्मेदारी की भावना। वे जानते थे कि परिवार केवल अधिकारों से नहीं चलता, जिम्मेदारियों से चलता है। समाज केवल लाभ से नहीं चलता, सहभागिता से चलता है।आज हमारे पास उनसे अधिक धन है, अधिक शिक्षा है, अधिक तकनीक है, अधिक अवसर हैं। लेकिन क्या हमारे पास उतनी ही जिम्मेदारी है?शायद यही वह प्रश्न है जिससे हम बचते रहते हैं।हम अपने बच्चों के लिए संपत्ति छोड़ने की चिंता करते हैं, लेकिन क्या हम उनके लिए बेहतर संस्थाएँ छोड़ रहे हैं? हम उनकी पढ़ाई की चिंता करते हैं, लेकिन क्या हम उन्हें नागरिकता की समझ दे रहे हैं? हम चाहते हैं कि वे सफल हों, लेकिन क्या हम चाहते हैं कि वे जिम्मेदार भी हों?
हो सकता है आपके पूर्वज आपके घर, आपकी नौकरी और आपकी उपलब्धियों को देखकर प्रसन्न हों। लेकिन हो सकता है वे एक और प्रश्न पूछें— “तुमने अपने समय के अन्याय के खिलाफ क्या किया?””तुमने अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए क्या किया?””तुमने अपने बच्चों को केवल कमाना सिखाया या जिम्मेदारी भी सिखाई?””तुमने अपने अधिकारों का उपयोग किया या केवल शिकायतें कीं?”और शायद सबसे असुविधाजनक प्रश्न यह होगा— “हमने तुम्हें जो देश सौंपा था, क्या तुम उसे अगली पीढ़ी को बेहतर स्थिति में सौंप रहे हो?” यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर किसी डिग्री, बैंक बैलेंस या सामाजिक प्रतिष्ठा से नहीं दिया जा सकता। क्योंकि इतिहास में किसी पीढ़ी का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होता कि उसने कितना उपभोग किया।उसका मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि उसने अपने हिस्से की जिम्मेदारी कितनी निभाई।इसलिए अगली बार जब आप अपने पूर्वजों की तस्वीर देखें, तो केवल उन्हें याद मत कीजिए। एक क्षण के लिए यह भी सोचिए कि यदि वे आज वापस आ जाएँ और आपके सामने बैठ जाएँ, तो क्या वे केवल आपसे प्रेम करेंगे, या आप पर गर्व भी करेंगे? क्योंकि प्रेम तो पूर्वज बिना शर्त करते हैं। लेकिन गर्व कमाना पड़ता है।
लेखक : सी एम जैन