सी एम जैन
आंदोलन कौन कर रहा है—जनता, विपक्ष या राजनीति?दिल्ली के जंतर-मंतर से झारखंड की सड़कों तक बदलते किरदारों के बीच सबसे बड़ा सवाल—आंदोलनकारी की आवाज़ कहाँ है?*राजनीति की सबसे सुविधाजनक बात यही है कि *आंदोलन का श्रेय कोई नहीं लेता, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ लेने में कोई पीछे नहीं रहता। सत्ता में बैठे लोग कहते हैं—आंदोलन विपक्ष की साजिश है। विपक्ष कहता है—यह जनता की आवाज़ है। सत्ता बदलती है तो बयान बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं और कई बार उसी आंदोलन को देखने का पूरा चश्मा ही बदल जाता है। लेकिन इस पूरी राजनीति के बीच सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति अक्सर वही रह जाता है जिसकी आवाज़ से आंदोलन शुरू हुआ था—आंदोलनकारी। सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र क्यों उतरे, झारखंड में छात्र क्यों सड़क पर आए या किस राजनीतिक दल ने किस आंदोलन का समर्थन किया। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—
*आंदोलन जनता की आवाज़ हैं या राजनीति के लिए उपलब्ध सबसे प्रभावशाली हथियार?*
इस सवाल का उत्तर खोजने से पहले एक बात स्वीकार करनी होगी कि किसी आंदोलन में शामिल छात्रों की समस्या को केवल इसलिए झूठा नहीं कहा जा सकता क्योंकि बाद में कोई राजनीतिक दल उनके साथ खड़ा दिखाई देता है। छात्र की समस्या वास्तविक हो सकती है, उसकी पीड़ा वास्तविक हो सकती है और उसकी मांग भी पूरी तरह जायज हो सकती है। लेकिन समस्या के वास्तविक होने का अर्थ यह नहीं कि उसके आसपास की राजनीति भी अनुपस्थित है। आज की राजनीति में यह मान लेना भी भोलेपन से कम नहीं कि हर बड़ा आंदोलन केवल स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश होता है। जनता के भीतर असंतोष पैदा हो सकता है, लेकिन उस असंतोष को कितनी हवा मिलेगी, कौन उसे मंच देगा, कौन उसे कैमरे तक पहुँचाएगा, कौन उसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाएगा और कौन उससे राजनीतिक लाभ उठाएगा—ये अलग-अलग सवाल हैं। *आंदोलन की ईमानदारी और उसके राजनीतिक इस्तेमाल की संभावना एक ही चीज नहीं हैं।
*दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन इसी जटिलता को सामने लाता है। आंदोलन में छात्र नेता नेहा बोरा और उनके साथियों की सक्रियता से लेकर बाद में आंदोलन के राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आने तक एक ऐसा घटनाक्रम बना जिसमें छात्र मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया। Sonam Wangchuk का जंतर-मंतर पहुँचना और अनशन से जुड़ना इस आंदोलन को एक अलग राष्ट्रीय दृश्यता देने वाला घटनाक्रम बना। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 28 जून 2026 से शुरू हुआ यह आंदोलन कई दिनों तक चला और शिक्षा तथा परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को लेकर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया। बाद में आंदोलन में राजनीतिक नेताओं की मौजूदगी और समर्थन भी दिखाई दिया। Rahul Gandhi ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद इसे छात्रों की जीत बताया और कहा कि शिक्षा व्यवस्था देश की पहचान रही है। यहीं से राजनीति का दूसरा चेहरा दिखाई देता है। जब आंदोलन भाजपा सरकार के सामने खड़ा था, तब विपक्ष उसके साथ दिखाई दिया। भाजपा की ओर से आंदोलन के पीछे राजनीतिक भूमिका होने के आरोप लगाए गए। विपक्ष ने ऐसे आरोपों को स्वीकार नहीं किया। स्वाभाविक भी है—राजनीति में कोई दल खुले मंच से यह क्यों स्वीकार करेगा कि किसी आंदोलन को उसने राजनीतिक रूप से हवा दी? लेकिन यही तर्क दूसरी दिशा में भी लागू होता है। यदि दिल्ली में विपक्ष के किसी राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि विपक्ष ने उसे स्वीकार नहीं किया, तो झारखंड में भाजपा की भूमिका की संभावना को भी केवल सरकार के आरोप के आधार पर सच नहीं मान लिया जा सकता। *आरोप दोनों तरफ हैं; प्रमाण ही वह चीज है जो आरोप और सत्य के बीच अंतर करती है।
*फिर झारखंड सामने आया और कहानी का राजनीतिक कोण लगभग उलट गया। यहाँ हेमंत सोरेन की सरकार है, कांग्रेस उसके साथ है और भाजपा विपक्ष में है। झारखंड में JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। छात्रों और सरकार के बीच बातचीत भी हुई, लेकिन छात्र प्रतिनिधियों ने कहा कि ठोस समाधान होने तक आंदोलन जारी रहेगा। दूसरी ओर भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने सरकार और प्रशासन पर आंदोलनकारियों को दबाने का आरोप लगाया, जबकि प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भाजपा पर छात्रों को राजनीतिक लाभ के लिए गुमराह करने और आंदोलन को राजनीतिक उद्देश्य से भड़काने का आरोप लगाया। यानी दिल्ली में समीकरण था—
*भाजपा सत्ता में, विपक्ष आंदोलन के साथ।* झारखंड में समीकरण है—*हेमंत सोरेन की सरकार सत्ता में, भाजपा आंदोलन के साथ।
* किरदार बदल गए, राजनीतिक बयान बदल गए और आंदोलन को देखने की भाषा भी बदल गई। तब सवाल उठना स्वाभाविक है—*आंदोलन के सिद्धांत सत्ता बदलते ही कैसे बदल जाते हैं?
*यदि दिल्ली में आंदोलनकारी पर कार्रवाई लोकतंत्र पर हमला थी, तो झारखंड में वैसी ही कार्रवाई कानून-व्यवस्था कैसे बन सकती है?
यदि झारखंड में छात्र अपनी मांग के लिए सड़क पर उतरकर लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो दिल्ली में छात्रों की मांग को राजनीतिक साजिश कहने की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि दोनों जगह छात्र वास्तव में अपनी समस्याओं के लिए सड़क पर थे, तो फिर राजनीतिक दलों की भूमिका को लेकर इतनी अलग-अलग व्याख्याएँ क्यों हैं?
*यदि लाठी आंदोलनकारी पर पड़े तो वह दिल्ली में लोकतंत्र की हत्या है और झारखंड में कानून-व्यवस्था—तो समस्या लाठी में है या सत्ता की कुर्सी में?
*यही वह प्रश्न है जो किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं जाता। यह उस राजनीतिक दोहरेपन के खिलाफ जाता है जिसमें सत्ता में रहते हुए आंदोलन समस्या दिखाई देता है और विपक्ष में रहते हुए वही आंदोलन लोकतंत्र की आवाज़ बन जाता है। सत्ता आंदोलन को विपक्ष की साजिश कहकर कमजोर करना चाहती है; विपक्ष उसी आंदोलन को जनता की आवाज़ बताकर सत्ता पर हमला करना चाहता है। लेकिन आंदोलनकारी की मूल समस्या दोनों राजनीतिक व्याख्याओं के बीच कहीं दब जाती है।और यहीं सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आती है—
*आंदोलन जनता का हो सकता है, दर्द जनता का हो सकता है, मांग जनता की हो सकती है; लेकिन आंदोलन की दिशा और उसकी राजनीतिक कीमत हमेशा जनता तय करे, यह जरूरी नहीं।*
क्या इसका अर्थ यह है कि दिल्ली के पीछे विपक्ष था या झारखंड के पीछे भाजपा है? नहीं। ऐसा निष्कर्ष बिना प्रमाण के पत्रकारिता नहीं होगा। लेकिन इन सवालों को पूछना भी बंद कर देना निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं होगी। राजनीति अपने हाथ के निशान छोड़कर आंदोलन नहीं करती। कोई राजनीतिक दल आंदोलन स्थल पर जाकर यह घोषणा नहीं करता कि “यह आंदोलन हमने करवाया है।” इसलिए पत्रकार का काम किसी अदृश्य हाथ की कहानी गढ़ना नहीं, बल्कि घटनाओं का क्रम देखना, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को देखना, हितों को देखना और सबसे महत्वपूर्ण—
*किसे लाभ हुआ, यह पूछना है।*क्योंकि *पैटर्न प्रमाण नहीं होता, लेकिन पैटर्न को देखकर सवाल पूछना भी अपराध नहीं है।*
आरोप कहना अलग बात है, संभावना पर सवाल उठाना अलग। पत्रकारिता का काम अदालत बनकर फैसला सुनाना नहीं, बल्कि ऐसे सवाल सामने रखना है जिनसे सत्ता और विपक्ष दोनों असहज हों।इसलिए सवाल होना चाहिए—किसे आंदोलन से राजनीतिक लाभ मिल रहा है? किसे राष्ट्रीय चर्चा मिल रही है? किसे सत्ता पर हमला करने का अवसर मिल रहा है?
किसकी राजनीतिक जमीन मजबूत हो रही है? कौन-सा मुद्दा लगातार चर्चा में रहकर दूसरे मुद्दों को पीछे धकेल रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण—*क्या राजनीतिक दलों का वास्तविक लक्ष्य समस्या का समाधान है, या समस्या से पैदा होने वाली राजनीतिक ऊर्जा अधिक उपयोगी है?*
यहीं दिल्ली से झारखंड तक की कहानी 2029 की राजनीति से जुड़ जाती है। 2029 में लोकसभा चुनाव होने हैं। यदि विपक्ष यह मानता है कि 2026 से 2029 तक छात्रों, शिक्षा और दूसरे जनमुद्दों से जुड़े आंदोलनों को लगातार राजनीतिक ऊर्जा देकर भाजपा के खिलाफ एक ऐसा वातावरण तैयार किया जा सकता है जो चुनाव तक सत्ता-विरोधी लहर में बदल जाए, तो यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है। क्योंकि *आंदोलन को जिंदा रखना और समस्या को जिंदा रखना एक बात नहीं है।*
आज जिस समस्या पर छात्र सड़क पर हैं, जरूरी नहीं कि 2029 में भी वही समस्या उसी तीव्रता से मौजूद रहे। सरकार के पास समय है। वह परीक्षा व्यवस्था में सुधार कर सकती है, भर्ती प्रक्रिया बदल सकती है, शिक्षा क्षेत्र में कोई बड़ी योजना ला सकती है, युवाओं के लिए कोई बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है और आज जिस मुद्दे पर सरकार कठघरे में है, वही मुद्दा कल सरकार की उपलब्धि बन सकता है।
*राजनीति में सबसे बड़ा जोखिम यह है कि विपक्ष जिस मुद्दे को सरकार की कमजोरी समझकर लगातार कुरेदता रहे, सरकार उसी मुद्दे पर समाधान देकर उसे अपनी उपलब्धि में बदल दे।*इसलिए लंबा आंदोलन हमेशा बड़ा आंदोलन नहीं होता। कई बार आंदोलन जितना लंबा चलता है, उतना ही सामान्य होता जाता है। मीडिया का ध्यान दूसरे मुद्दों पर चला जाता है, जनता की प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं और जो मुद्दा कभी राष्ट्रीय संकट दिखाई देता था, वह धीरे-धीरे रोजमर्रा के राजनीतिक शोर में खो जाता है। इसके उलट सरकार यदि उसी अवधि में समाधान का कोई बड़ा कदम उठा देती है तो आंदोलन की राजनीतिक धार अचानक कुंद हो सकती है।यहाँ विपक्ष के सामने दूसरी समस्या भी है। भारत को केवल शिक्षा के मुद्दे पर वर्षों तक एक सूत्र में बाँधना आसान नहीं है। देश में बेरोजगारी है, महंगाई है, किसान हैं, स्वास्थ्य है, रोजगार है, स्थानीय भ्रष्टाचार है, विस्थापन है और हर वर्ग, हर उम्र तथा हर क्षेत्र की अपनी प्राथमिकताएँ हैं। छात्र समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन पूरा समाज नहीं। इसलिए यह मान लेना कि एक छात्र आंदोलन की निरंतरता अपने आप राष्ट्रीय सत्ता-विरोधी आंदोलन में बदल जाएगी, भारतीय समाज की विविधता को कम करके आंकना हो सकता है।और एक विडंबना और है।
*एक मुद्दे को लगातार राष्ट्रीय बहस में बनाए रखने की राजनीतिक कोशिश दूसरे जरूरी मुद्दों को उसी बहस के नीचे दबा सकती है।* तब आंदोलन सरकार को कमजोर करने के बजाय अनजाने में सरकार के लिए सुविधाजनक भी हो सकता है—क्योंकि जनता का ध्यान सीमित है और राजनीति में हर लगातार दोहराया गया मुद्दा दूसरे किसी मुद्दे की जगह लेता है।लेकिन इसका अर्थ आंदोलन को दोष देना नहीं है।*आंदोलन लोकतंत्र की बीमारी नहीं, लोकतंत्र का अलार्म है।* जब संस्थाएँ सुनती हैं तो सड़क पर उतरने की जरूरत कम होती है। जब व्यवस्था सुनना बंद करती है तो सड़क बोलती है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि छात्र आंदोलन क्यों कर रहे हैं।
असली सवाल यह है—*उन्हें अपनी बात सुनाने के लिए आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है?*यदि सरकार आंदोलन खत्म करने के लिए समस्या का समाधान करती है तो आंदोलन लोकतंत्र की सफलता है। लेकिन यदि विपक्ष आंदोलन को केवल सरकार गिराने की सीढ़ी और सत्ता आंदोलन को केवल विपक्ष की साजिश बताने का हथियार मानती है, तो दोनों ही स्थिति में आंदोलनकारी की समस्या पीछे चली जाती है।जनता को न भाजपा का आंदोलन चाहिए, न कांग्रेस का, न JMM का। *जनता को अपनी समस्या का समाधान चाहिए।* राजनीतिक दलों के लिए आंदोलन सत्ता के समीकरण का हिस्सा हो सकता है, लेकिन आंदोलनकारी के लिए वह उसकी जिंदगी, भविष्य, परीक्षा, नौकरी और सम्मान का सवाल हो सकता है। यही अंतर सबसे महत्वपूर्ण है और इसलिए असली सवाल यह नहीं कि दिल्ली के आंदोलन के पीछे कौन था और झारखंड के आंदोलन के पीछे कौन है। असली सवाल यह है—*जब जनता सड़क पर उतरती है तो राजनीतिक दल उसके साथ इसलिए खड़े होते हैं क्योंकि उन्हें जनता की समस्या दिखाई देती है, या इसलिए क्योंकि उन्हें सत्ता में बैठे अपने प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी दिखाई देती है?
*इस सवाल का उत्तर शायद किसी राजनीतिक दल के बयान में नहीं मिलेगा। सत्ता अपनी मजबूरी बताएगी, विपक्ष अपनी नैतिकता बताएगा और आंदोलनकारी अपनी मांग। लेकिन इतिहास इन तीनों से आगे जाकर यह पूछेगा कि आखिर उस आंदोलन ने हासिल क्या किया और किसके लिए किया।क्योंकि राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है—
*सत्ता में रहते हुए आंदोलन समस्या दिखाई देता है, विपक्ष में रहते हुए वही आंदोलन लोकतंत्र की आवाज़ बन जाता है।*और यदि यही राजनीति का नियम बन गया है, तो फिर आंदोलनकारी नहीं बदल रहे।*सिर्फ उनके पीछे खड़े होने वाले चेहरे बदल रहे हैं।*यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा कटाक्ष भी है। आंदोलन का मालिक कोई नहीं बनता, लेकिन उसके राजनीतिक लाभ का उत्तराधिकारी बनने के लिए हर कोई तैयार रहता है। सत्ता कहती है—यह विपक्ष की साजिश है। विपक्ष कहता है—यह जनता की आवाज़ है। और जनता?
वह उसी सड़क पर खड़ी रहती है, अपनी वही मांग लेकर, अगली सरकार का इंतजार करती हुई।इसलिए लोकतंत्र के सामने अंतिम सवाल यह नहीं कि आंदोलन किसने शुरू किया। *असली सवाल यह है कि आंदोलन खत्म होने के बाद उसकी मांग किसने पूरी की।
* क्योंकि आंदोलन की सबसे बड़ी जीत सरकार का झुकना नहीं है। उसकी सबसे बड़ी जीत तब होगी, जब अगली पीढ़ी को उसी मांग के लिए फिर सड़क पर न उतरना पड़े।
और अगर हर पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी की वही मांग लेकर सड़क पर उतरना पड़ रहा है, तो फिर सवाल केवल सरकार से नहीं है। *सवाल उस पूरी राजनीति से है जो हर आंदोलन में जनता को देखती कम है और अपना अगला चुनाव ज्यादा देखती है।* शेष फिर।