विजय बहुगुणा, सत्य की गूंज
श्रीनगर गढ़वाल(ब्यूरो)। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर हेमवती नंदन बहुगुणा बेस अस्पताल श्रीनगर के मनोचिकित्सा विभाग की ओर से एक विशेष जागरूकता एवं शपथ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मानसिक परेशानियों को समय रहते पहचानना, संवेदनशीलता के साथ लोगों की बातें सुनना और जरूरत पड़ने पर उन्हें त्वरित चिकित्सकीय व मानसिक सहायता उपलब्ध कराना रहा।
कार्यक्रम की शुरुआत ‘खाली कुर्सी’ गतिविधि के साथ की गई, जो ऐसे व्यक्ति का प्रतीक थी जो हमारे बीच रहकर भी अपनी घुटन और परेशानी किसी से साझा नहीं कर पाता। कुछ पलों के मौन के बाद प्रतिभागियों को यह समझाया गया कि हर दर्द दिखाई नहीं देता, और किसी अपने से केवल यह पूछना— “क्या आप ठीक हैं? मैं आपकी बात सुनने के लिए तैयार हूँ”—भी किसी की जिंदगी बचा सकता है।
इसके साथ ही ‘जीने के 100 कारण’ गतिविधि के तहत मरीजों और प्रतिभागियों ने जीवन से जुड़े छोटे-छोटे खूबसूरत कारणों को साझा किया। इसमें माता-पिता व बच्चों का साथ, किसी अपने की मुस्कान, दोस्ती, अधूरे सपने, घर वापसी, पहाड़ों की सुबह, पसंदीदा संगीत और आने वाले कल की उम्मीद जैसे अनमोल पल शामिल रहे। संदेश दिया गया कि गहरे संकट के समय भले ही बड़े उद्देश्य न दिखें, लेकिन जीवन की छोटी-छोटी उम्मीदें भी आगे बढ़ने की वजह बन सकती हैं। प्रतिभागियों ने अनाम पर्चियों पर लिखकर किसी की भी बात सुनने और हरसंभव मदद करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम के दौरान सभी ने सामूहिक रूप से आत्महत्या रोकथाम की शपथ ली, जिसमें हर जीवन को महत्वपूर्ण मानने, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बातों को बिना किसी पूर्वाग्रह के सुनने और जरूरतमंद तक समय पर मदद पहुंचाने का संकल्प लिया गया।
कार्यक्रम का मुख्य संदेश —“मैं सुनूंगा। मैं पूछूंगा। मैं साथ रहूंगा।” तय किया गया। साथ ही, आपातकालीन मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन ‘टेली-मानस’ के नंबर 14416 की जानकारी भी उपस्थित लोगों के साथ साझा की गई।
इस महत्वपूर्ण आयोजन के दौरान चिकित्सा अधीक्षक डॉ. ए.एन. पांडेय, मनोचिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मोहित कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पार्थ दत्ता एवं डॉ. सैनी, सीनियर-जूनियर रेजिडेंट्स, अस्पताल के तमाम कर्मचारी, बड़ी संख्या में मेडिकल छात्र और मरीज उपस्थित रहे। अंत में यह संदेश दिया गया कि ऐसी शपथ की सार्थकता केवल कागजों या आयोजनों तक सीमित न रहकर, किसी जरूरतमंद की चुप्पी पहचानकर उसके साथ खड़े होने में है।