सत्य की गूंज
चमोली(ब्यूरो)। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विशेष निर्देशों पर उत्तराखंड के पर्यटन एवं ग्रामीण विकास सचिव धीराज सिंह गर्ब्याल ने भारत-तिब्बत सीमा पर स्थित सीमांत गांवों का विस्तृत दौरा किया। उन्होंने नीति, गमशाली, बाम्पा सहित कई उच्च हिमालयी गांवों का भ्रमण कर आगामी ‘नीति एक्सट्रीम अल्ट्रा रन मैराथन’ की तैयारियों की समीक्षा की और स्थानीय ग्रामीणों से सीधा संवाद किया।
सचिव धीराज सिंह गर्ब्याल ने बताया कि 31 मई से 2 जून 2026 तक आयोजित होने वाली ‘नीति एक्सट्रीम अल्ट्रा रन’ इस पूरे सीमांत क्षेत्र को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित कर देगी।
आदि कैलाश की तर्ज पर आयोजन: इस भव्य रेस का आयोजन ‘आदि कैलाश परिक्रमा अल्ट्रा मैराथन’ की तर्ज पर किया जा रहा है।
आर्थिकी को बूस्ट: इस आयोजन से क्षेत्र में हजारों पर्यटकों और एथलीटों के पहुंचने की उम्मीद है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ मिलेगा।
उन्होंने ग्रामीणों से अपने पैतृक घरों को पर्यटन विभाग की होमस्टे योजना के तहत विकसित करने का आग्रह किया। पर्यटक को आकर्षित करने के लिए पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन परोसने और जैविक खेती, मिलेट्स (मोटे अनाज) के उत्पादन व फलों के बगीचे लगाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन गतिविधियों से सीमांत निवासियों की आय के नए स्रोत बनेंगे और पलायन पर रोक लगेगी। ’हाउस ऑफ हिमालया’ ब्रांड से मिलेगा अंतरराष्ट्रीय बाजारग्रामीण विकास सचिव ने एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए बताया कि ग्रामीण विकास विभाग के “हाउस ऑफ हिमालया” ब्रांड के तहत पर्वतीय क्षेत्रों के जैविक उत्पादों और मिलेट्स को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचा जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साल 2023 में लॉन्च किया गया यह ब्रांड आज राज्य की महिलाओं और स्थानीय कारीगरों को आर्थिक रूप से सशक्त बना रहा है। नीति घाटी का भोटिया समुदाय पारंपरिक रूप से जैविक खेती करता है। अब इनके द्वारा उत्पादित अनाज, दालें, घी और शहद जैसे उत्पादों को फाइव स्टार होटलों के आउटलेट्स के माध्यम से बेचा जा रहा है, जिससे किसानों को उनके उत्पादों का बेहतरीन दाम मिल रहा है। संस्कृति का संरक्षण और ‘सस्टेनेबल टूरिज्म’ पर जोर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि नीति घाटी का पर्यटन विकास पूरी तरह से सस्टेनेबल (सतत) होना चाहिए। विकास के साथ-साथ भोटिया संस्कृति, पारंपरिक पहनावे, हस्तशिल्प और लोकगीतों का संरक्षण अनिवार्य है। इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management) और स्थानीय परंपराओं का सम्मान बेहद जरूरी है। ”इस सीमांत क्षेत्र में पर्यटकों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है। इसे एक बड़े अवसर में बदलें। होमस्टे, जैविक खेती और बागवानी के जरिए आपकी आय बढ़ेगी और क्षेत्र से बेरोजगारी पूरी तरह समाप्त होगी।”— श्री धीराज सिंह गर्ब्याल, सचिव – पर्यटन एवं ग्रामीण विकास, उत्तराखंड
