विजय बहुगुणा
श्रीनगर गढ़वाल(ब्यूरो) । हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र में एम०एम०टी०टी०सी० के तत्वावधान में आयोजित छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम “पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा का एकीकरण” के पाँचवें दिन विविध विषयों पर महत्वपूर्ण व्याख्यान आयोजित किए गए। कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा के बहुआयामी स्वरूप विशेषतः अर्थशास्त्र, योग एवं आसन, लोकवार्ता तथा पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कथाओं पर विशेषज्ञ वक्ताओं ने विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए।
इस अवसर पर जिज्ञासा यूनिवर्सिटी, देहरादून के प्रोफेसर अजय जोशी ने प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्र की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कौटिल्य के अर्थशास्त्र, राज्य-व्यवस्था, नैतिक अर्थचिंतन तथा समकालीन परिप्रेक्ष्य में उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि भारतीय अर्थदर्शन केवल धन-संचय तक सीमित नहीं, बल्कि लोककल्याण, न्यायपूर्ण शासन और संतुलित विकास की समन्वित अवधारणा प्रस्तुत करता है।
एसवीएम बीएड कॉलेज की डॉ० पूनम थपलियाल ने पंचतंत्र की कहानियों एवं लोकवार्ता की परम्परा पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भारतीय लोक-साहित्य में निहित नैतिक बोध, व्यावहारिक बुद्धिमत्ता और जीवन-दर्शन आज भी शिक्षण प्रक्रिया को समृद्ध कर सकते हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पंचतंत्र की कथाएँ केवल बाल-साहित्य नहीं, बल्कि नीति, नेतृत्व, संवाद-कौशल और सामाजिक समरसता का व्यावहारिक पाठ हैं।
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में प्रो० प्रशांत कंडारी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) और भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) के समन्वय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि एनईपी 2020 भारतीय ज्ञान परम्परा को मुख्यधारा के पाठ्यक्रम में समाहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो शिक्षा को भारतीय मूल्यों, परंपराओं और वैश्विक दृष्टिकोण के साथ संतुलित करने का मार्ग प्रशस्त करती है।
कार्यक्रम का अंतिम दिवस शनिवार को आयोजित होगा, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो० पवन सिन्हा का विशेष व्याख्यान प्रस्तावित है। आयोजकों के अनुसार यह व्याख्यान भारतीय ज्ञान परम्परा के दार्शनिक एवं ज्योतिषीय आयामों को समकालीन संदर्भ में समझने का अवसर प्रदान करेगा।
कार्यक्रम में विभिन्न महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और प्रतिभागियों की सक्रिय सहभागिता रही, जिससे भारतीय ज्ञान परम्परा के समग्र एकीकरण की दिशा में सार्थक संवाद स्थापित हुआ।
इस अवसर पर
यूजीसी पर्यवेक्षक प्रो० आर०एल० नारायण सिम्हा , निदेशक प्रो डीएस नेगी, कार्यक्रम समन्वयक डॉ अमरजीत परिहार, डॉ पुनीत वालिया आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ नरेंद्र चौहान और शोधार्थी शिवानी ने किया